Friday, 8 May 2015

प्राकृतिक संसाधन पर स्वामित्व सत्ता या व्यक्तिगत नहीं बल्कि समाज का ही होना चाहियें - महर्षि वशिष्ठ, राजा विश्वामित्र एवं कामधेनु प्रसंग ।

परिवर्तन विकास एंव जीवन का प्रतीक है और इसलिए बहुत आवश्यक है। परिवर्तण के परिणाम अच्छे और बुरें दोनो ही हो सकते है। अगर हमारा चितंन सतत रहेगा तो हम सही दिशा में प्रगति के पथ पर अग्रसर होगें अन्यथा भटक जाएगें। विचारों में विश्व को बदलने की शक्ति होती है।

प्रकृति के जो पंचतत्व है वे जीवन की मुलभूत आवश्यकताएं है। इनकी उपलब्धता प्रकृति ने प्रचुर मात्रा में सुनिश्चित की है। लेकिन प्रकृति का शोषण नहीं दोहन किया जाता है। गौपालन के माध्यम से हम इस दोहन की प्रकृया को बहुत अच्छी तरह समझ सकते है।
वैश्विक स्तर पर त्याग, ज्ञान और विचार का महत्व सता के अधिकार से ऊपर ही रहा है। हमारे उपनिषदों में ब्रह्मर्षि वसिष्ट, विश्वामित्र एंव कामधेनु गाय का प्रसंग बहुत प्रमुख्ता से आता है। इस प्रसंग के द्वारा भी दोनो विषय स्पष्ट होते है।
विश्वामित्र अपनी विशाल सेना सहित विजयी होकर अपने राज्य को लौट रहे थे। मार्ग में ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि वशिष्ठ का गुरुकुलमय आश्रम पड़ा। विश्वामित्र ने उनका आशीर्वाद लेने के विचार से आश्रम में प्रवेश किया। महर्षि वशिष्ठ ने राजा के रूप में उनका यथोचित सम्मान किया और कुछ समय आश्रम में रुककर आतिथ्य स्वीकार करने का विनम्र निवेदन किया। विश्वामित्र ने कहा, ``आप जैसे तपस्वी ऋषिवर का आतिथ्य स्वीकार करना मेरे लिये गौरव एवं सम्मान की बात होगी, किन्तु मेरे साथ एक लाख से अधिक का सैनिक-समूह तथा काफी संख्या में हाथी-घोड़े हैं '' इस पर मुनिवर वशिष्ठ ने कहा, ``राजन, मेरे इस गुरुकुल में आपको और आपके सैनिक-समूह को किसी प्रकार की असुविधा तथा कष्ट नहीं होगा।
महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में कपिला नामक अलौकिक क्षमता युक्त एक कामधेनु गाय थी, जिससे आश्रम तथा गुरुकुलवासियों को कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं हुआ। कामधेनु की अलौकिक क्षमता से आश्रम वासियों की आवश्यकताओं की निर्बाध एवं निरंतर आपूर्ति हो जाती थी। दो दिन तक ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के गुरुकुलमय आश्रम में मिले आदर तथा सत्कार से अभिभूत होकर विश्वामित्र ने कहा, ``हम आपके इस आतिथ्य सत्कार के लिये सदैव कृतज्ञ रहेंगे। एक राजा के रूप में तो मुझे आपके गुरुकुल तथा आश्रम को कोई अमूल्य भेंट देनी चाहिए, किन्तु युद्ध से लौटने के कारण यह संभव नहीं है। परन्तु में यह जानने का इच्छुक हुं की आपके गुरुकुल में इतनी सारी व्यलस्थाए कैसे संभव हुई। जिसपर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उत्तर देते हुए कहा कि हमारे पास एक कामधेनु गाय है जो सभी आवश्यक्ताओं की पुर्ति करती है। यह जानकर विश्वामित्र ने कहा फिर तो इसे हमारे पास होना चाहिए। इसके उत्तर में ऋषिवर ने कहा, ``राजन, कामधेनु गाय देना मेरे लिये संभव नहीं है। इस गौमाता की महत्ती कृपा से ही इस आश्रम तथा गुरुकुल का निर्बाध संचालन हो पा रहा है। यह हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। महल में तो ऐश आराम हेतु इसका दुरुपयोग ही होगा'' ब्रह्मर्षि के मना करने पर हठी राजा विश्वामित्र ने कामधेनु गाय को बलपुर्वक ले जाने का प्रयास किया। तो कपिला गाय के खुरों से असीम सैनिकों की उत्पत्ति हुई, जिससे विश्वामित्र को पराजित होकर खिन्न मन से अपने राज्य को लौटना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये। इस घटना के पश्चात् ही विश्वामित्र ने राजपाट का त्याग कर दिया। और उन्हे समझ आया कि ब्रम्ह तेज सत्ता की शक्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और प्रकृति के संसोधन समाज की आवश्यक्ताओं की पूर्ति क् लिए ही है ना कि भोग विलीस कू पूर्ति क् लिए तथा सत्ता के पूर्ण अधिकीर से उनकी दुरुपयोग ही होगा।

हमारा प्रकृति का संदेश एंव गौमाता के महत्व को जन जन तक पहुंचाना आवश्यक है। गौ संदेश मासिक पत्रक एंव गौशाला का यहीं उद्देश्य भी आप सब के सहयोग एंव कृपा से आने वाले समय में हम अपनी पूर्ण निष्ठा से गौशाला का कार्य करगें और विश्वास रखतें है कि हम अपने सभी उद्देश्यों में पूर्ण सफलता प्राप्त करेंगें। 

Thursday, 7 May 2015

गौ संवर्धन एवं कृषि

वैदिक काल में समद्ध खेती का मुख्य कारण कृषि का गौ आधारित होना था। प्रत्येक घर में गोपालन एवं पंचगव्य आधारित कृषि होती थी, तब हम विश्व गुरू के स्थान पर थे। भारतीय मनीषियों ने संपूर्ण गौवंश को मानव के अस्तित्व, रक्षण, पोषण, विकास एवं संवर्धन के लिये आवश्यक समझा और ऐसी व्यवस्थाऐं विकसित की थी जिसमें जन मानस को विशिष्ट शक्ति बल तथा सात्विक वृद्धि प्रदान करने हेतु गौ दुग्ध, खेती के पोषण हेतु गोबर-गौमूत्र युक्त खाद, कृषि कार्यो एवं भार वहन हेतु बैल तथा ग्रामद्योग के अंतर्गत पंचगव्यों का घर-घर में उत्पादन किया जाता था। प्राचीन काल से ही गोपालन भारतीय जीवन शैली व अंर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग रहा है।
वर्तमान में मनुष्य को अनेकों समस्याओं जैसे मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण असंतुलन, जल का दूषित होना, कृषि भूमि का बंजर होना आदि से जूझना पड़ रहा हैं। इन विपरित परिस्थतियों में हमें अपने आप को स्वस्थ एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न रखना है तो दैनिक जीवन में गौ-दूग्ध एवं पंचगव्य उत्पादों का तथा कृषि में गौबर एवं गौमूत्र से उत्पादित कीटनाशकों एवं जैविक खादों का उपयोग बढ़ाना होगा।
भारत वर्ष ही एक एैसा राष्ट्र है जिसमें दूध उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। आज हमारा देश संसार में सर्वाधिक 140.3 मिलीयन टन दूध उत्पादन करने वाला देश हैं। जो 2019-20 तक 177 मिलीयन टन बढकर हो जाने का अनुमान है। भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 290 ग्राम है जो संसार के औसत उपलब्धता से ज्यादा हैं। पिछले 5 वर्षो में भारत का दूध उत्पादन 25 मिलीयन टन बढ़ा, इसकी तुलना में अमेरिका में 6.6 मिलीयन टन, चीन में 5.4 मिलीयन टन एवं न्यूजीलैन्ड में 2.7 मिलीयन टन ही बढ़ा। इससे सिद्ध होता है कि हमारा पशुपालक एवं पशुधन किसी से कम नहीं है।
यद्यपि हमारे पास 304 मिलीयन का विशाल दुधारू पशुधन है, जिसमें 16.60 करोड़ भारतीय नस्लकीदेशी व 3.3 करोड़ संकर नस्ल की गाये है तथा 10.53 करोड़ भैसे है, जिनसे 7 करोड़ पशुपालकों द्वारा प्रतिदिन 33 करो़ड लीटर दूध का उत्पादन किया जाता है, जो अपने आप में एक कीर्तिमान हैं।
समय समय पर निति निर्धारकों एवं चिंतको द्वारा ऐसे विचार व्यक्त किये जाते रहे है कि भारत में दूध उत्पादन में ब़ढ़ोतरी करने हेतु संकर गायों की संख्या बढ़ानी होगी। तथापि देशी गायों की उत्पादकता को उत्तरोतर बढ़ाने के उपाय करने होंगें। भारतीय गौवंश गुणवत्ता के आधार पर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और सभी विदेशी नस्लों में श्रेयस्कर है। भारत में अधिक दूध देने वाली नस्लें भी है गुजरात राज्य की गीर नस्ल की गाय ने ब्राजील में आयोजित विश्व प्रतियोगिता में 64 लीटर दूध देकर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है। भारतीय नस्लों की गायों का दूध अधिक गुणकारी है जिसमें प्रोटीन ।.2 किस्म की होती है, जिसकी प्रकृति धमनियों में रक्त जमाव विरोधी, कैसंर विरोधी एवं मधुमेह विरोधी होती है, इसलिए देशी गाय का दूध दौहरा लाभदायक है वहीं भारतीय गाय के दूध में बच्चों के दिमाग की वृद्धि करने हेतु आवश्यक तत्व सेरेब्रोसाईड, कन्जूगेटेड लिनोलिक ऐसिड एवं ओमेगा थ्री फेटी ऐसिड आवश्यक अनुपात में पाया जाता है।
भारतीय गौवंश में 34 निर्धारित एवं 30 स्थानीय नस्लें अपने-अपने प्रजनन क्षैत्रों में बखूबी योगदान दे रही है। साहीवाल, गीर, रेडसिन्धी, राठी और थारपारकर नस्ल की गायें प्रजनन एवं उत्पादन दोनों में श्रेष्ठ है। उचित प्रबन्धन से इन नस्लों की गायें 12-18 लीटर दूध प्रतिदिन देते हुए दूध की जरूरत को पूरा कर, ग्रामीणों को वर्षपर्यन्त रोजगार एवं भूमि को उपजाऊ बनाऐ रखने के लिए जैविक खाद उपलब्ध करवा सकती है।
हमारे पास देशी गौवंश में 4.80 करोड़ दुधारू गायों सहित 8.92 करोड़ व्यस्क मादा देशी गौवंश है, जिनकी उत्पादकता बढ़ाकर, दो ब्यांत का अन्तराल कम कर दूध एवं दूध उत्पादों की बढ़ती मांगो का पूरा किया जा सकता है । लेकिन हमारे पशुपालकों द्वारा पुराने प्रचलित सिद्धातों जैसे केवल भूसा या कड़वी ही खिलाना, घरों में उपलब्ध एक या दो खाद्यान्न वह भी अल्प मात्रा में दूध देते समय अपने सुविधा अनुसार खिलाना, पशु प्रबंधन जैसे-
ब्याने के पूर्व नहीं खिलाना, ब्याने के 2 माह बाद ग्याभिन नहीं करवाना, नियमित रूप से नमक एवं खनिज मिश्रण नहीं देना, बिमार पशुओं का उचित उपचार नहीं करवाना आदि को अपनाया जाता है, जिनके परिणामस्वरूप पीक दूध उत्पादन का कम होना या एक ब्यांत में कम दिनों तक कम दूध का देना एवं दो ब्यांत का अन्तराल बढ जाने से कम दूध उत्पादन होने की बजह से गोपालन व्यवसाय अलाभकारी सिद्ध होता जा रहा है, जबकि देशी गायों की क्षमता प्रतिदिन 10 से 12 लीटर दूध देते हुये 1 ब्यात में 2000 से 2500 लीटर दूध देने एवं प्रतिवर्ष ब्याने की हैं। इस क्षमता का दौहन करने की आवश्यकता है।
अनुसंधान परिणाम दर्शाते है कि संतुलित आहार से दूध उत्पादन बढ़ता है, उत्पादन लागत घटती हैं तथा मीथेन गैस उत्सर्जन में कमी आती है। दुधारू गायों को संतुलित आहार खिलाये बिना केवल अनुवांशिक क्षमता बढ़ा कर बेहतर दूध प्राप्त करना संभव नहीं है। आमतौर पर दूधारू गायों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पशु खाद्य पदार्थ, घास एवं सूखे चारे तथा फसल अवशेष ही खिलाये जाते हैं, जिनके फलस्वरूप उनका आहार प्रायः असंतुलित रहता है और उसमें प्रोटीन, ऊजो, खनिज तत्वों तथा विटामिनों की मात्रा कम या ज्यादा हो जाती हैं। असंतुलित आहार न केवल गायों के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है अपितु दूग्ध उत्पादन में होने वाली आय को भी प्रभावित करता है, क्योकि आहार खर्च में दुग्ध उत्पादान की कुल लागत का 70 प्रतिशत हिस्सा होता हैं। पशुओं की प्रजनन एवं दूध उत्पादन क्षमता में सुधार लाने, दो ब्यात का अन्तराल कम करने तथा दूध उत्पादको की शुद्ध आय में बढ़ोतरी हेतु दूध उत्पादकों को संतुलित आहार के बारे में शिक्षित करना अत्यन्त आवश्यक है।
हरा चारा पशुओं के लिये पोषक तत्वों का एक किफायती स्त्रोत है परन्तु इसकी उपलब्धता सीमित है। चारे की खेती के लिये सीमित भूमि के कारण, चारा फसलों एवं आम चारागाह भूमि से चारे की उत्पादकता में सुधार पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है साथ ही अतिरिक्त उत्पादित हरे चारे के संरक्षण के तरीकों को प्रदर्शित करना होगा, जिससे कि हरे चारे की कमी के समय इनकी उपलब्धता बढ़ाई जा सके।
विभिन्न प्रयोगों में पाया गया है कि खनिज तत्वों की कमी वाले आहारों का निरन्तर उपयोग करते रहने से पशु शरीर में उपस्थित खनिजों के क्रियात्मक संयोगों एवं विशिष्ठ सांद्रताओं में परिवर्तन उत्पन्न हो जाते है कई प्रकार की व्याधिया उत्पन्न हो जाती है। पशुओं को दूध देने, पुनः ग्याभिन होने एवं ब्याने के दौरान प्रोटीन व ऊर्जा की ज्यादा आवश्यकता पड़ने के कारण खनिज तत्वों एवं विटामिनों की आवश्यकता बढ़ जाती है। अतः पशुओं की सामान्य वृद्धि दर, प्रजनन क्षमता एवं उत्पादन के स्तर को बनाये रखने के लिए सभी खनिज तत्व प्रर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाना आवश्यक है। इन दिनों अधिकांश गौपालकों द्वारा महसूस किया जाने लगा है कि गायों को पर्याप्त मात्रा में दाना/बाटा/चारा देने के उपरान्त भी दूध उत्पादन में कमी, प्रजनन क्षमता में कमी, अधिक उम्र में परिपक्व होना, समय पर ग्याबिन नहीं होना आम बात हो गई है।
दूध के साथ निकलने वाले खनिजों की पूर्ति करने एवं पशु शरीर की सामान्य वृद्धि व उत्पादन के स्तर को बनाये रखने, परासरण दाब एवं तापमान को नियंत्रित रखने के लिए नियमित रूप से पशु की इच्छा अनुसार या पच्चीस से 30 ग्राम साधारण नमक एवं 40-50 ग्राम कम्पलीट खनिज मिश्रण अवश्य ही दिया जाना चाहिये।

गौ पालन और गाय के रखरखाव में कई सारी कमियों के बावजूद आज भारत विश्व का प्रथम स्थान वाला दुध उत्पादित देश है। अगर हम अपनी इन कमियों को कम करने की कोशिश करते है तो हम दुध उत्पादन की क्षमता का अंदाजा भी नहीं लगा सकते है। गाय के पालन और रखरखाव में बुनियादी चीजों को जोड़ने से देश की न सिर्फ अर्थव्यवस्था को फायदा होगा, बल्कि भारत की रीड़ भारतीय किसानो को भी पैकेट खाद्य और नए तकनीक के उपकरणों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा। जो जमीन को समय अंतराल पर बंजड़ बना देते है। गौपालन एंव गौसंवर्धन में जागरुकता लाकर हम दुध उत्पादन में विश्व नम्बर एक पर बने रहने वरण और कई क्षेत्र में कई देशों से आगे निकल सकते है।

Thursday, 30 April 2015

गौ हत्या बन्दी - ऐतिहासिक आंकलन

गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है। गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है। परन्तु इसका कतई मतलब यह नहीं है कि इन चीजो की प्रप्ति के लिए समय से पहले ही इसकी हत्या कर दी जाए और तर्क यह दिया जाए की इससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा हो रहा है। भारत और दुनिया के कई ऐसी जगह है जहां गायों की निर्मम हत्या कि जा रही है। हालाकि इसे रोकने के लिए हिन्दुओं के द्वारा कई वर्षों से प्रयास किया जाता रहा है। इसी संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बाते।।
इस स्थिति के सही आकलन के लिए गोहत्या बन्दी पर चल रहे आन्दोलनों के इतिहास को विस्तार से समझना आवश्यक है।
ग़ौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर गौकशी होती है। यह सब गौ मांस और उसके अवशेषों के लिए किया जाता है, जिससे भारी मुनाफ़ा होता है। मांस के लिए गायों को तस्करी के ज़रिए पड़ोसी देशों में भेजा जाता है। इस सबकी वजह से सवा अरब से ज़्यादा की आबादी वाले इस देश में दुधारू पशुओं की तादाद महज़ 16 करोड़ ही है। पिछने कई साल के आकड़ो में केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनिमल हसबेंडरी के मुताबिक़, 1951 में 40 करोड़ की आबादी पर 15 करोड़ 53 लाख पशु थे। इसी तरह 1962 में 93 करोड़ की आबादी पर 20 करोड़ 45 लाख, 1977 में 19 करोड़ 47 लाख, 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हज़ार पशु बचे और 2009 में यह तादाद घटकर महज़ 16 करोड़ रह गई। बरस दर बरस इस संख्‍या में गिरावट दर्ज की जा रही है। राजधानी दिल्ली में 19.13 फ़ीसदी दुधारू पशु कम हुए हैं, जबकि गायों की दर 38.63 फ़ीसदी घटी है। फौरी तौर पर उपरोक्‍त आंकड़ों पर नज़रे फिराने भर से भी स्थिति स्‍पष्‍ट हो जाती है।
10 सितम्बर, 1952 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री माधव सदाशिव गोलवलकर श्री गुरू जीने गौहत्या बन्दी कानून पर देश भर से एकत्रित किए गए लगभग 1 करोड से अधिक हस्ताक्षर तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद को सौंपा। 22 फरवरी, 1953 को आर्यसमाज की सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा में गौहत्या बन्दी पर प्रस्ताव पारित किया। 4 फरवरी, 1954 को स्वामी प्रभूदत्त ब्रह्मचारी जी की प्रधानता में एक अखिल भारतीय गौहत्या विरोधी समिति बनी और देश भर में जनान्दोलन हुए। जनान्दोलन के भारी दबाव में 5 सितम्बर, 1955 को उत्तरप्रदेश सरकार तथा 5 अक्टूबर, 1955 को बिहार सरकार द्वारा गौहत्या निवारण कानून पारित कर दिया गया. देश की सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गौहत्या बन्दी का विषय आया तो सर्वोच्च न्यायालय की पूरी पीठ ने 23 अप्रैल, 1958 को अपना निर्णय गौहत्या बन्दी के पक्ष में दिया। गाय, बछडे की हत्या को सम्पूर्णतया बन्द करने की कार्यवाही को वैध माना गया और मुसलमानों की गौहत्या करने की धार्मिक अधिकार वाली बात को अमान्य कर दिया गया. उपयोगी पशुओं की हत्या पर रोक स्वीकार कर ली गई परंतु अनुपयोगी पशुओं की हत्या पर छूट रही।

गौहत्या बन्दी को लेकर वर्ष 1962 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में देश भर में पुन: आन्दोलन शुरू किया गया परंतु चीन द्वारा भारत से युद्ध छेड देने पर इस आन्दोलन को वापस लेना पडा परंतु 7 नवम्बर, 1966 देश की संसद के सामने लाखों लोगों द्वारा प्रदर्शन किया गया परंतु सरकार ने गौहत्या बन्दी को लेकर आन्दोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर सरकार ने गोली चलवा दिया. गौहत्या बन्दी को लेकर पुरी के शंकराचार्य महाराज जी और आचार्य विनोबा भावे के अनशन को सरकारी आश्वासन देकर खत्म करा दिया गया. 1 जनवरी, 1994 से आन्ध्रप्रदेश के यांत्रिक कत्लखाने अलकबीर के विरुद्ध व्यापक जनान्दोलन चला. परिणामत: 27 सितम्बर, 1994 को अलकबीर यांत्रिक कत्लखाने के मालिकों को उसे बन्द करने का फैसला करना पडा. 28 सितम्बर, 2009 से विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा शुरू हुई जो कि 108 दिन में लगभग 28 हजार कि.मी. की दूरी तय कर 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में सम्पन्न हुई.

31 जनवरी, 2010 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल को देश भर के लगभग 10 करोड से अधिक हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपा गया जिसमें से लगभग 11 लाख मुस्लिम तथा लगभग 76 हजार ईसाई प्रतिनिधियों के भी हस्ताक्षर थे। गाजियाबाद के ग्लोबल फूड्स लिमेटेड, डेराबस्सी जैसे अनेक कत्लखानों के विरुद्ध अभी भी गौहत्या बन्दी को लेकर देश भर में आन्दोलन चल रहा है।

तो वहीं भाजपा की सरकार आने से देशवासीयों में एक आशा की किरण जगी है। इसकी वजह यह है कि जन्माष्टमी के अवसर पर मोदी जी ने लोगों से आग्रह किया था कि वे गौहत्या को बढ़ावा दे रही गुलाबी क्रांति’ (मांस व्यापार प्रसार) को अस्वीकार कर दें।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने गुजरात जैसे कुछ राज्यों द्वारा अपने यहां लागू किए गए गौहत्या प्रतिबंध कानून पर आधारित मॉडल बिल को अन्य राज्यों के विचार के लिए जारी करने के संबंध में विधि मंत्रालय से राय मांगी है। इस मॉडल बिल को प्रसारित करने के पीछे प्रधानमंत्री कार्यालय का मकसद अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार के कानून को लागू करने पर विचार करने के लिए राज्यों को कहना है।
सरकार की विधि शाखा को भेजे गए पत्र में पीएमओ ने संविधान के एक ऐसे ही प्रावधान का हवाला दिया है जो गौ वध और अन्य दुधारू पशुओं के वध को प्रतिबंधित करता है। संविधान का अनुच्छेद 48 कहता है, राज्य को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से कृषि एवं पशुपालन के प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए और विशेष रूप से नस्लों में सुधार और उनके संरक्षण, गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू पशुओं और मवेशियों के वध पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए पत्र में यह उल्लेख भी किया गया है कि वर्ष 2005 में उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार द्वारा गौ वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए लागू किए गए कानून की वैधता को बरकरार रखा था।
उत्तर प्रदेश, झारखंड और गुजरात जैसे कई राज्य हैं जिन्होंने गौवध को प्रतिबंधित किया हुआ है। महाराष्ट्र ने हाल ही में इस प्रकार का प्रतिबंध लगाया है। जिसमें यह तय किया गया है कि
·         गायों के खरीद बिकरी पर रोक लगा दि जाएगी।
·         गायों को मार कर उसके मांस के आयात निर्यात पर रोक होगी।
·         और इस कानून को न मानने, गायों की हत्या, और खरीद बिकरी करते पाए जाने वालों को 5 साल की सजा और 10000 रुपए जुर्माना देना होगा, साथ ही यह कानून के अन्तर्गत दोषी को जमानत भी नहीं मिलेगी।
देश को पूर्ण विकसित बनाने का सपना पूरा करना है तो हमें सबसे पहले गौवंश का विकास एंव सेवा का संकल्प लेना होगा। गौ माता की रक्षा के लिए पूरे समाज को आगे आना चाहिए ताकि गौ हत्या न हो सके।हमें गाय से केवल दूध लेना ही नहीं बल्कि उसकी सेवा करना भी सीखना चाहिए। समय रहते अगर चेता नहीं गया तो खराब परिणाम ही मिलेंगे।इसमें फिर कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। किसी भी बेजुबान की बेवजह या फिर अपने निजी स्‍वार्थ के लिए उसकी हत्‍या कर देना कायरता का दूसरा रूप है। और अन्त में गौहत्या बन्दी का मूल्यांकन केवल आर्थिक आधार पर नहीं हो सकता यह करोड़ो हिन्दुओं की आस्था का सवाल है।
लेखक

गोपाल अग्रवाल