Thursday, 30 April 2015

गौ हत्या बन्दी - ऐतिहासिक आंकलन

गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है। गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्‍डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है। परन्तु इसका कतई मतलब यह नहीं है कि इन चीजो की प्रप्ति के लिए समय से पहले ही इसकी हत्या कर दी जाए और तर्क यह दिया जाए की इससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा हो रहा है। भारत और दुनिया के कई ऐसी जगह है जहां गायों की निर्मम हत्या कि जा रही है। हालाकि इसे रोकने के लिए हिन्दुओं के द्वारा कई वर्षों से प्रयास किया जाता रहा है। इसी संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बाते।।
इस स्थिति के सही आकलन के लिए गोहत्या बन्दी पर चल रहे आन्दोलनों के इतिहास को विस्तार से समझना आवश्यक है।
ग़ौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर गौकशी होती है। यह सब गौ मांस और उसके अवशेषों के लिए किया जाता है, जिससे भारी मुनाफ़ा होता है। मांस के लिए गायों को तस्करी के ज़रिए पड़ोसी देशों में भेजा जाता है। इस सबकी वजह से सवा अरब से ज़्यादा की आबादी वाले इस देश में दुधारू पशुओं की तादाद महज़ 16 करोड़ ही है। पिछने कई साल के आकड़ो में केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनिमल हसबेंडरी के मुताबिक़, 1951 में 40 करोड़ की आबादी पर 15 करोड़ 53 लाख पशु थे। इसी तरह 1962 में 93 करोड़ की आबादी पर 20 करोड़ 45 लाख, 1977 में 19 करोड़ 47 लाख, 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हज़ार पशु बचे और 2009 में यह तादाद घटकर महज़ 16 करोड़ रह गई। बरस दर बरस इस संख्‍या में गिरावट दर्ज की जा रही है। राजधानी दिल्ली में 19.13 फ़ीसदी दुधारू पशु कम हुए हैं, जबकि गायों की दर 38.63 फ़ीसदी घटी है। फौरी तौर पर उपरोक्‍त आंकड़ों पर नज़रे फिराने भर से भी स्थिति स्‍पष्‍ट हो जाती है।
10 सितम्बर, 1952 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री माधव सदाशिव गोलवलकर श्री गुरू जीने गौहत्या बन्दी कानून पर देश भर से एकत्रित किए गए लगभग 1 करोड से अधिक हस्ताक्षर तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद को सौंपा। 22 फरवरी, 1953 को आर्यसमाज की सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा में गौहत्या बन्दी पर प्रस्ताव पारित किया। 4 फरवरी, 1954 को स्वामी प्रभूदत्त ब्रह्मचारी जी की प्रधानता में एक अखिल भारतीय गौहत्या विरोधी समिति बनी और देश भर में जनान्दोलन हुए। जनान्दोलन के भारी दबाव में 5 सितम्बर, 1955 को उत्तरप्रदेश सरकार तथा 5 अक्टूबर, 1955 को बिहार सरकार द्वारा गौहत्या निवारण कानून पारित कर दिया गया. देश की सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गौहत्या बन्दी का विषय आया तो सर्वोच्च न्यायालय की पूरी पीठ ने 23 अप्रैल, 1958 को अपना निर्णय गौहत्या बन्दी के पक्ष में दिया। गाय, बछडे की हत्या को सम्पूर्णतया बन्द करने की कार्यवाही को वैध माना गया और मुसलमानों की गौहत्या करने की धार्मिक अधिकार वाली बात को अमान्य कर दिया गया. उपयोगी पशुओं की हत्या पर रोक स्वीकार कर ली गई परंतु अनुपयोगी पशुओं की हत्या पर छूट रही।

गौहत्या बन्दी को लेकर वर्ष 1962 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में देश भर में पुन: आन्दोलन शुरू किया गया परंतु चीन द्वारा भारत से युद्ध छेड देने पर इस आन्दोलन को वापस लेना पडा परंतु 7 नवम्बर, 1966 देश की संसद के सामने लाखों लोगों द्वारा प्रदर्शन किया गया परंतु सरकार ने गौहत्या बन्दी को लेकर आन्दोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर सरकार ने गोली चलवा दिया. गौहत्या बन्दी को लेकर पुरी के शंकराचार्य महाराज जी और आचार्य विनोबा भावे के अनशन को सरकारी आश्वासन देकर खत्म करा दिया गया. 1 जनवरी, 1994 से आन्ध्रप्रदेश के यांत्रिक कत्लखाने अलकबीर के विरुद्ध व्यापक जनान्दोलन चला. परिणामत: 27 सितम्बर, 1994 को अलकबीर यांत्रिक कत्लखाने के मालिकों को उसे बन्द करने का फैसला करना पडा. 28 सितम्बर, 2009 से विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा शुरू हुई जो कि 108 दिन में लगभग 28 हजार कि.मी. की दूरी तय कर 17 जनवरी, 2010 को नागपुर में सम्पन्न हुई.

31 जनवरी, 2010 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल को देश भर के लगभग 10 करोड से अधिक हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपा गया जिसमें से लगभग 11 लाख मुस्लिम तथा लगभग 76 हजार ईसाई प्रतिनिधियों के भी हस्ताक्षर थे। गाजियाबाद के ग्लोबल फूड्स लिमेटेड, डेराबस्सी जैसे अनेक कत्लखानों के विरुद्ध अभी भी गौहत्या बन्दी को लेकर देश भर में आन्दोलन चल रहा है।

तो वहीं भाजपा की सरकार आने से देशवासीयों में एक आशा की किरण जगी है। इसकी वजह यह है कि जन्माष्टमी के अवसर पर मोदी जी ने लोगों से आग्रह किया था कि वे गौहत्या को बढ़ावा दे रही गुलाबी क्रांति’ (मांस व्यापार प्रसार) को अस्वीकार कर दें।
प्रधानमंत्री कार्यालय ने गुजरात जैसे कुछ राज्यों द्वारा अपने यहां लागू किए गए गौहत्या प्रतिबंध कानून पर आधारित मॉडल बिल को अन्य राज्यों के विचार के लिए जारी करने के संबंध में विधि मंत्रालय से राय मांगी है। इस मॉडल बिल को प्रसारित करने के पीछे प्रधानमंत्री कार्यालय का मकसद अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार के कानून को लागू करने पर विचार करने के लिए राज्यों को कहना है।
सरकार की विधि शाखा को भेजे गए पत्र में पीएमओ ने संविधान के एक ऐसे ही प्रावधान का हवाला दिया है जो गौ वध और अन्य दुधारू पशुओं के वध को प्रतिबंधित करता है। संविधान का अनुच्छेद 48 कहता है, राज्य को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से कृषि एवं पशुपालन के प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए और विशेष रूप से नस्लों में सुधार और उनके संरक्षण, गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू पशुओं और मवेशियों के वध पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा भेजे गए पत्र में यह उल्लेख भी किया गया है कि वर्ष 2005 में उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार द्वारा गौ वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए लागू किए गए कानून की वैधता को बरकरार रखा था।
उत्तर प्रदेश, झारखंड और गुजरात जैसे कई राज्य हैं जिन्होंने गौवध को प्रतिबंधित किया हुआ है। महाराष्ट्र ने हाल ही में इस प्रकार का प्रतिबंध लगाया है। जिसमें यह तय किया गया है कि
·         गायों के खरीद बिकरी पर रोक लगा दि जाएगी।
·         गायों को मार कर उसके मांस के आयात निर्यात पर रोक होगी।
·         और इस कानून को न मानने, गायों की हत्या, और खरीद बिकरी करते पाए जाने वालों को 5 साल की सजा और 10000 रुपए जुर्माना देना होगा, साथ ही यह कानून के अन्तर्गत दोषी को जमानत भी नहीं मिलेगी।
देश को पूर्ण विकसित बनाने का सपना पूरा करना है तो हमें सबसे पहले गौवंश का विकास एंव सेवा का संकल्प लेना होगा। गौ माता की रक्षा के लिए पूरे समाज को आगे आना चाहिए ताकि गौ हत्या न हो सके।हमें गाय से केवल दूध लेना ही नहीं बल्कि उसकी सेवा करना भी सीखना चाहिए। समय रहते अगर चेता नहीं गया तो खराब परिणाम ही मिलेंगे।इसमें फिर कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। किसी भी बेजुबान की बेवजह या फिर अपने निजी स्‍वार्थ के लिए उसकी हत्‍या कर देना कायरता का दूसरा रूप है। और अन्त में गौहत्या बन्दी का मूल्यांकन केवल आर्थिक आधार पर नहीं हो सकता यह करोड़ो हिन्दुओं की आस्था का सवाल है।
लेखक

गोपाल अग्रवाल

देसी गायों का महत्व

हृदय रोग से बचाता हें गाय माता का दूध
भारतीय संस्कृति में गाय का बेहद उच्च स्थान है। इसे कामधेनु कहा गया है। इसका दूध बच्चों के लिए बेहद पौष्टिक माना गया है और बुद्धि के विकास में कारगर भी। उसमें भी देसी नस्ल की गाय का दूध ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। आखिर देसी नस्ल की गाय में क्या खूबियां होती हैं जो उसके दूध का इतना महत्व होता है। गाय के दूध का महत्व उसमें मौजूद तत्व बढ़ाते हैं।सेहत के लिहाज से गाय का दूध फायदेमंद तो है ही, कुछ वर्ष पहले एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि हिमाचल प्रदेश में पली-बढ़ी गाय के दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन हृदय की बीमारी, मधुमेह से लड़ने में कारगर और मानसिक विकास में सहायक होता है।गाय और गाय के दूध के बारे जितना कहा जाए उतना ही कम होगा। भारत और खासकर हिन्दू धर्म में तो गाय के महान और अनमोल गुणों को देखते हुए उसे मां, देवी और भगवान का दर्जा दिया गया है, जो कि उचित भी है। भारतीय गायों की एक खाशियत ऐसी है जो दुनिया की अन्य प्रजातियों की गायों में नहीं होती। भारतीय नश्ल की गायों के शरीर में एक सूर्य ग्रंथि यानी सन ग्लैंड्स पाई जाती है। इस सूर्य ग्रंथि की ही यह खाशियत है कि यह उसके दूध को बेहद गुणकारी और अमूल्य औषधी के रूप में बदल देती है।
देसी गायों के दूध में ए-2 बीटा प्रोटीन मिलता है जो हृदय की बीमारी, मधुमेह और मानसिक रोग के खिलाफ सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हॉलस्टीन और जर्सी नस्ल की गायों में यह प्रोटीन नहीं पाया जाता।गाय के दूध में प्रति ग्राम 3.14 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। आयुर्वेद के अनुसार गाय के ताजा दूध को बहुत उत्तम माना जाता है। गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होता है जो शरीर के लिए काफी शक्तिदायक और आसानी से पचने वाला होता है। गाय की गर्दन के पास एक कूबड़ होती है जो ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। गाय की इसी कूबड़ के कारण उसका दूध फायदेमंद होता है। वास्तव में इस कूबड़ में एक सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती रहती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता रहता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है। इसलिए गाय का दूध भी हल्का पीला रंग का होता है। यह स्वर्ण शरीर को मजबूत करता है, आंतों की रक्षा करता है और दिमाग भी तेज करता है। इसलिए गाय का दूध सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है।
आइये जाने देसी गायों के बारे में—-
क्या हें ए12 दूध विज्ञान :.
जीव विज्ञान के अनुसार भारतीय गायों के 209 तत्व के डीएनए DNA में 67 पद पर स्थित एमिनो एसिड प्रोलीन Proline पाया जाता है. इन गौओं के ठंडे यूरोपीय देशों को पलायन में भारतीय गाय के डीएनए में प्रोलीन Proline एमीनोएसिड हिस्टीडीन Histidine के साथ उत्परिवर्तित हो गया. इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में म्युटेशन Mutation कहते हैं.
 (देखें-Kwai-रुको KF, Grosclaude F.2002:. दूध प्रोटीन की जेनेटिक बहुरूपता. में: पीएफ फॉक्स और McSweeney PLH सम्पादित लेख उन्नत डेयरी रसायन विज्ञान ,737-814, Kluwer शैक्षणिक / सर्वागीण सभा प्रकाशक, न्यूयॉर्क)
 1. मूल गाय के दूध में Proline अपने स्थान 67 पर बहुत दृढता से आग्रह पूर्वक अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्यूसीन Isoleucine से जुडा रहता है. परन्तु जब प्रोलीन के स्थान पर हिस्टिडीन आ जाता है तब इस हिस्टिडीन में अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीन से जुडे रहने की प्रबल इच्छा नही पाई जाती। इस स्थिति में यह एमिनो एसिड Histidine, मानव शरीर की पाचन क्रिया में आसानी से टूट कर बिखर जाता है। इस प्रक्रिया से एक 7 एमीनोएसिड का छोटा प्रोटीन स्वच्छ्न्द रूप से मानव शरीर में अपना अलग आस्तित्व बना लेता है. इस 7 एमीनोएसिड के प्रोटीन को बीसीएम 7 BCM7 (बीटा Caso Morphine7) नाम दिया जाता है.
 2. BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम परिवार का मादक तत्व है। जो बहुत शक्तिशाली Oxidant ऑक्सीकरण एजेंट के रूप में मानव स्वास्थ्य पर अपनी श्रेणी के दूसरे अफीम जैसे ही मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोडता है. जिस दूध में यह विषैला मादक तत्व बीसीएम 7 पाया जाता है, उस दूध को वैज्ञानिको ने ए1 दूध का नाम दिया है. यह दूध उन विदेशी गौओं में पाया गया है जिन के डीएन मे 67 स्थान पर प्रोलीन न हो कर हिस्टिडीन होता है.
आरम्भ में जब दूध को बीसीएम7 के कारण बडे स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूज़ीलेंड के सारे डेरी उद्योग के दूध का परीक्षण आरम्भ हुआ। सारे डेरी दूध पर करे जाने वाले प्रथम अनुसंधान मे जो दूध मिला वह बीसीएम7 से दूषित पाया गया। इसी लिए यह सारा दूध ए1 कह्लाया
तदुपरांत ऐसे दूध की खोज आरम्भ हुई जिस मे यह बीसीएम7 विषैला तत्व न हो. इस दूसरे अनुसंधान अभियान में जो बीसीएम7 रहित दूध पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया. सुखद बात यह है कि विश्व की मूल गाय की प्रजाति के दूध मे, यह विष तत्व बीसीएम7 नहीं मिला,
इसी लिए देसी गाय का दूध ए2 प्रकार का दूध पाया जाता है.
देसी गाय के दूध मे यह स्वास्थ्य नाशक मादक विष तत्व बीसीएम7 नही होता. आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देसी गाय के दूध और दूध के बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते। भारतीय परम्परा में इसी लिए देसी गाय के दूध को अमृत कहा जाता है. आज यदि भारतवर्ष का डेरी उद्योग हमारी देसी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत सारे विश्व डेरी दूध व्यापार में सब से बडा दूध निर्यातक देश बन सकता है.
देसी गाय की पहचान—–
प्रामाणिक रूप से यह जानने के लिए कि कौन सी गाय मूल देसी गाय की प्रजाति की हैं गौ का डीएनए जांचा जाता है. इस परीक्षण के लिए गाय की पूंछ के बाल के एक टुकडे से ही यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह गाय देसी गाय मानी जा सकती है या नहीं . यह अत्याधुनिक विज्ञान के अनुसन्धान का विषय है.
पाठकों की जान कारी के लिए भारत सरकार से इस अनुसंधान के लिए आर्थिक सहयोग के प्रोत्साहन से भारतवर्ष के वैज्ञानिक इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं और निकट भविष्य में वैज्ञानिक रूप से देसी गाय की पहचान सम्भव हो सकेगी. इस महत्वपूर्ण अनुसंधान का कार्य दिल्ली स्थित महाऋषि दयानंद गोसम्वर्द्धन केंद्र की पहल और भागीदारी पर और कुछ भारतीय वैज्ञानिकों के निजी उत्साह से आरम्भ हो सका है.
आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था मे बच्चों को केवल ए2 दूध ही देना चाहिये. विश्व बाज़ार में न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ, जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेरी दूध के दाम से कही अधिक हैं .ए2 दूध देने वाली गाय विश्व में सब से अधिक भारतवर्ष में पाई जाती हैं. यदि हमारी देसी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन का प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है. यह एक बडे आर्थिक महत्व का विषय है.

छोटे ग़रीब किसनों की कम दूध देने वाली देसी गाय के दूध का विश्व में जो आर्थिक पक्ष है वह बहुत महत्व हो सकता है। परन्तु दुख इस बात का है कि गाय की कोई भी बात कहो तो उस मे सम्प्रदायिकता दिखाई देती है, चाहे यह कितना भी देश के लिए आर्थिक और समाजिक स्वास्थ्य के महत्व का विषय हो। इस मानसिकता को हम सबको बदलना होगा।

Wednesday, 15 April 2015

राष्ट्रीय गोकुल मिशन की सरकारी पहल

केंद्र सरकार ने 28 जुलाई 2014 को स्वदेशी गायों के संरक्षण और नस्लों के विकास को वैज्ञानिक तरीके से प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन (राष्ट्रव्यापी योजना) की शुरुआत की. यह मिशन राष्ट्रीय पशु प्रजनन एवं डेयरी विकास कार्यक्रम (एनपीबीबीडीडी) पर केन्द्रित परियोजना है. इस मिशन का शुभारंभ केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने नई दिल्ली में किया.
इसकी विषेशता इस प्रकार है, 500 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मिशन को देशभर में लागू करने के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत एक हजार गाय पालने वाले सगठनों तथा आश्रमों को सरकार केंद्रीय सहायता देगी।लेकिन इसमें शर्त यह होगी कि 40 प्रतिशत गायें बिना दूध देने वाली बूढ़ी व बीमार होनी चाहिए और 60 प्रतिशत दुधारु होनी चाहिए। मिशन के तहत गौपालन के लिए छतदार आवास, पानी, साफ-सफाई आदी शर्तो का पालन संस्थाओं को करना होगा।
मिशन के उद्देश्य
·         स्वदेशी नस्लों का विकास और संरक्षण.
·         स्वदेशी पशु नस्लों के लिए नस्ल सुधार कार्यक्रम शुरु करना ताकि अनुवांशिक सुधार और पशुओं की संख्या में वृद्धि की जा सके.
·         दूध उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए.
·      नॉनडेसक्रिप्ट पशुओं का गीर, साहीवाल, राठी, देउनी, थारपारकर, रेड सिन्धी और अन्य कुलीन स्वदेशी नस्लों के जरिए अपग्रेडेशन करना.
·         प्राकृतिक सेवाओँ के लिए उच्च आनुवंशिक योग्यता वाले सांडों का वितरण.
इस परियोजना के लिए सरकार ने वित्त वर्ष 2014–15 में 150 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. जबकि, 12वीं पचवर्षीय योजना में इस कार्यक्रम पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं.
योजना के तहत धन का आवंटन इस प्रकार किया जाएगा
·         एकीकृत स्वदेशी पशु केंद्र जैसे गोकुल ग्राम की स्थापना.
·         उच्च आनुवांशिक योग्यता वाले स्वदेशी नस्लों के संरक्षण के लिए बुल मदर फार्म्स को मजबूत बनाना.
·         प्रजनन तंत्र में क्षेत्र प्रदर्शन रिकॉर्डिंग (एफपीआर) की स्थापना.
·         सर्वश्रेष्ठ जर्मप्लाज्म को रखने वाले संस्थानों/ संगठनों को सहायता देना .
·         बड़ी आबादी के साथ स्वदेशी नस्लों के लिए वंशावरी चुनाव कार्यक्रम का कार्यान्वयन.
·         ब्रीडर्स सोसायटी: गोपालन संघ की स्थापना.
·         प्राकृतिक सेवाओँ के लिए उच्च आनुवंशिक योग्यता वाले रोगमुक्त सांडों का वितरण.
·         स्वदेशी नस्लों के कुलीन पशुओं को रखने वाले किसानों को प्रोत्साहन.
·         बछिया पालन कार्यक्रम, किसानों को पुरस्कार (गोपाल रत्न) और ब्रीडर्स सोसायटी (कामधेनु).
·         स्वदेशी नस्लों के लिए दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता का आयोजन.
·         स्वदेशी पशु विकास कार्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों में काम करने वाले तकनीकी और गैरतकनीकी लोगों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन.
गोकुल ग्राम
मिशन के तहत स्वदेशी पशु केंद्रों या गोकुल ग्राम की स्थापना स्वदेशी नस्लों के प्रजनन इलाकों में की जाएगी. गोकुल ग्राम की स्थापना पीपीपी मॉडल के तहत की जाएगी और इसकी स्थापना.
·         देशी प्रजनन इलाकों में और शहरी पशु आवास के लिए महानगरों के निकट की जाएगी.
गोकुल ग्राम किसानों के लिए प्रशिक्षण केंद्र में आधुनिक सुविधाएं प्रदान करेगा. मेट्रोपोलिटन गोकुल ग्राम का केंद्र शहरी पशुओं के आनुवांशिक उन्नयन पर होगा.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन का आर्थिक परिप्रेक्ष्य 
गोकुल ग्राम एक संस्थान होगा जो निम्नलिखित चीजों की बिक्री के जरिए आर्थिक संसाधन पैदा करेगा.
दूध, जैविक खाद, केंचुआखाद, मूत्र डिस्टिलेट, घरेलू खपत के लिए बायो गैस से बिजली का उत्पादन, पशु उत्पादों की बिक्री
ये गतिविधियां गोकुल ग्रामों को आत्मनिर्भर संगठन बनाएंगी.
पशुओं को बीमारियों से मुक्त कैसे रखा जाएगा?
नस्लों को बीमारी मुक्त रखने के लिए जानवरों को जीडी, टीबी और ब्रूसीलोसिंस जैसी बीमारियों से बचाने के लिए नियमित जांच की जाएगी. इसके अलावा, गोकुल ग्राम में एक डिस्पेंसरी और एआई केंद्र भी होगा।
इस स्कीम मे रजिस्ट्रेशन और लाभ
इस स्कीम से जुड़ने और इसके लाभ पाने के लिए आप  राष्ट्रीय पशु प्रजनन एवं डेयरी विकास कार्यक्रम  के तेहत रजिस्ट्रेशन कराकर गौ सेवा में अग्रसर हो सकते है। इस स्कीम से जुड़ने और जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे कुछ लींक दिए जा रहे है।